Chhath Nahay Khay

Date - 12 November 2018

Sunday

Chhath Kharna

Date - 12 October 2018

Monday

Chhath Sandhya Argh

Date - 13 November 2018

Chhath Evening Argh Time - 5:28 PM
Tuesday, November 13, 2018 (IST)

Sunset in Swami Dayanand Enclave, Burari, Delhi

Chhath Morning Argh

Date - 14 November 2018

Chhath Morning Argh Time - 6:43 AM
Wednesday,November 14, 2018 (IST)
Sunrise in Swami Dayanand Enclave, Burari, Delhi

Maha Kumbh Mela

कुंभ मेला 2018

Bathing Dates of Magh Mela 2018
Paush Purnima - 02 January 2018
Makar Sankranti - 14 January 2018
Mauni Amavasya - 16 January 2018
Basant Panchami - 22 January 2018
Maghi Poornima - 31 January 2018
Maha Shivratri - 13 February 2018


Bathing Dates of Ardh Kumbh Mela 2019
Makar Sankranti (1St shahi Snan) - 14/15 January 2019
Paush Purnima - 21 January 2019
Mauni Amavasya (Main Royal Bath 2nd Shahi Snan) - 04 February 2019
Basant Panchami (3rd shahi Snan) - 10 February 2019
Maghi Poornima - 19 February 2019
Maha Shivratri - 04 March 2019

कुंभ पर्व का आयोजन
 
कुम्भ पर्व के आयोजन के लिए सबसे प्रचलित कथा है देव औरदैत्यों के बीच जो समुद्र मंथन हुआ था | इस कथा के अनुसार जब महर्षि दुर्वासा ऋषि के श्राप  के कारण इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए थे | और दानवों  ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के कहने पर सभी देवता गण दानवों के साथ मिलकर अमृत निकालने के लिए तैयार हो गए | जैसे ही अमृत कलश समुद्र से बाहर निकला तो देवताओं के संकेत करने पर देवराज इंद्र का पुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गया | उसके बाद दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने दैत्यों को अमृत कलश को वापस लाने का आदेश दिया | इसके बाद दानवो ने जयंत का पीछा किया और कठिन परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ लिया | उसके बाद अमृत कलश पर अपना-अपना अधिकार स्थापित करने के लिए देवों और दानवों के बीच बारह दिनों तक लगातार बिना रुके युद्ध होता रहा |
इस युद्ध  के दौरान  पृथ्वी के चार स्थानों इलाहाबाद ( प्रयाग ),हरिद्वार, उज्जैन, नासिकपर अमृत कलश से अमृत की कुछ बूँदें गिरी थीं |  उस समय चंद्रमा ने कलश से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने कलश के  फूटने से, गुरु ने दानवों  के अपहरण से एवं शनि देव  ने इंद्र  के भय से कलश की रक्षा की। कलेश शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण करके ( देव और दानवों ) सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव और दानव के बीच हो रहे युद्ध का अंत हो गया।
 
अमृत प्राप्त करने के लिए देवो और दानवों के अविराम बारह दिनों तक युद्ध हुआ था | मनुष्यों के बारह वर्ष देवताओं के बारह दिनों के बराबर होते है | इसीलिए कुंभ भी बारह होते हैं। इनमे से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और बाकि के आठ कुंभ देवलोक में होते हैं | जिसे देवतागण ही प्राप्त कर सकते है मनुष्य वहाँ नहीं पहुंच सकता | जिस समय में चंद्रमा ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।
 
कुंभ मेला इतिहास
 
कुंभ मेले का इतिहास लगभग आठ सौ पचास ( 850 ) साल पुराना है। यह माना जाता है कि आदि शंकराचार्य कुंभ मेले की शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी।समुद्र मंथन में निकले अमृत कलश से अमृत की कुछ बूँदें हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक इन चार स्थानों पर गिरी थी | इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। बारह वर्ष बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है।कुछ पुरातत्व से पता चलता है कि कुंभ मेला 525 बीसी में शुरू हुआ था।महा कुंभ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस विषय के बारे विद्वानों के अलग - अलग मत है | पहले ( वैदिक और पौराणिक काल ) में कुंभ तथा अर्ध  कुंभ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का  नहीं थी । कुछ विद्वानों का कहना है की गुप्त काल में कुंभ स्नान की व्यवस्था सुव्यवस्थित थी | लेकिन  प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन( 617-647 ई. ) के समय से प्राप्त होते हैं।इसके बाद में जगतगुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की थी |
 

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