Chhath Puja History Origin Rituals and Traditions , The Yogic Philosophy of Chhath Benefits of Chhath Process Daily Sun Meditation (Chhath Process) 27-30 October 2014
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Chhath puja katha in Hindi

Monday, 10 June 2013

Chhath puja katha in Hindi

 

   Chhath Puja History Origin Rituals and Traditions , The Yogic Philosophy of Chhath Benefits of Chhath Process Daily Sun Meditation (Chhath Process) 7-8  November  2013

 

छठ पूजा भारत वर्ष में सूर्य भगवान् की उपासना करने का सबसे बड़ा व्रत हैं ! लोक प्रियता की दृष्टी तथा जनमानस की आस्था के आधार पर भारत वर्ष के बिहार प्रान्त का सबसे महत्वपूर्ण व्रत एवं सर्वाधिक प्रचलित व्रत यह छठ पूजा या सूर्य षष्ठी व्रत हैं ! इसे अन्य कई नामों जैसे डाला छठ, छठ, सूर्य षष्ठी आदि से भीजाना जाता हैं !

 

सूर्य षष्टी में भगवान् सूर्य की पूजा होती हैं ! सूर्य भगवान् जो कि पूरे संसार को ऊर्जा प्रदान करते हैं, अपितु उनके प्रकाश से ही यह सारा संसार प्रकाशमान हैं ! भगवान् सूर्य के द्वारा दी गई ऊर्जा को जिससे पृथ्वी पर जीवन का विस्तार और सृष्टि का सृजन पूर्ण रूप से सुचारित हैं इसी आभार और सूर्य भगवान् की कृपा दृष्टी के लिए छठ का त्यौहार प्रति वर्ष श्रद्धालुओं द्वारा मनाया जाता हैं !

 

सूर्य षष्टी 

 

सूर्य भगवान ही ऐसे देवता हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष व् अपने आँखों से देख सकते हैं ! पूरी सृष्टि पर ऊर्जा का मुख्य श्रोत भी भगवान् सूर्य ही हैं !


इस व्रत के प्रभाव व् मनोवांक्षित फल की प्राप्ति के उद्देश्य को देखे तो यह व्रत अब सिर्फ बिहार प्रान्त में ही नहीं अपितु अन्य प्रान्तों में, अन्य देशों में भी मनाया जाता हैं !
हिन्दू ही नहीं मुस्लिम लोगो की भी इस व्रत में आस्था बढ़ रही हैं और यह लोकप्रियता के शीर्ष पर हैं !

 

षष्ठी देवी / छठी मैया

 

ब्रह्मवैवर्त पुराण के आधार पर प्रकृति देवी के एक अंश को देवशेना कहा जाता हैं ! देवशेना मातृका देवियों में सबसे श्रेष्ठ देवी मानी जाती हैं जो समस्त लोकों के बालकों व् बालिकाओं की रक्षिता देवी हैं ! प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी को षष्ठी देवी और छठी मैया / मईया के नाम से भी जाना जाता हैं !

षष्ठी देवी बालकों की रक्षिता व् आयुप्रदा देवी हैं ! नवजात शिशु के जन्म के पश्चात षष्ठी के दिन ही पूजन व् आरधना की जाती हैं ! षष्ठी देवी माँ या छठी मैया प्रजनन व् विकास की देवी भी मानी जाती हैं ! प्रसूता को प्रथम स्नान भी इसी दिन कराया जाता हैं ! पुराणों में वर्णित माँ कात्यायनी भी इन्ही देवी स्वरुप हैं ! और जिन्हें स्कन्द माता बालकों की रक्षिता देवी के नाम से भी जाना जाता हैं ! जिनकी पूजा नवरात्र में की जाती हैं !

छठी मैया और सूर्य देव दोनों की समायोजित पूजन व् आराधना सूर्य षष्ठी पूजन व् व्रत हैं !

कार्तिक शुक्ल में षष्ठी तिथि को सूर्य देव के प्रकाशमान होने पर व्रतियों द्वारा सूर्य देव की प्रथम आरोग्य किरण को निर्जला व्रत करके जल में खड़े होकर, माँ षष्ठी देवी से अपने परिवार जनों के लिए आरोग्यता की कामना करना व् आराधना करना सूर्य षष्ठी व्रत को निरुपित करता हैं !

जिस प्रकार नवजात शिशु के जन्म पर माताए षष्ठी देवी से अपने शिशु के अच्छे स्वास्थ्य व् लम्बी आयु की कामना करती हैं, उसी प्रकार षष्ठी देवी की प्रत्यक्ष रूप से सूर्य षष्ठी व्रत में सूर्य देव के सामने प्रत्यक्ष खड़े होकर व्रती द्वारा यह व्रत सम्पन्न किया जाता हैं !

सूर्य षष्ठी व्रत का प्रभाव स्वयमेव देखा जा सकता हैं कि इस व्रत को करने वाले व्रती को चरक आदि त्वचा से सम्बंधित कोई भी रोग ग्रसित नहीं करती हैं !

छठ पूजा कथा के सन्दर्भ में कई कहानियाँ पुराणों में वर्णित मिलती हैं ! जिनमे से कुछ कथाये इस प्रकार हैं !

 

 छठ पूजा की प्रथम कथा

 

१ - महाभारत में वर्णित कई आलेखों को देखे तो सर्वप्रथम यह व्रत कुंती पुत्र कर्ण द्वारा किये जाने का उल्लेख मिलता हैं !

महाभारत के आरम्भिक अध्ययन के अनुसार पांडू जब हस्तिनापुर के राजा बने तब एक दिन आखेट करते हुए ऋषि कन्दम और उनकी पत्नी पर हिरण समझकर धोखे में तीर चला देने के कारण, उनकी प्रणय काल के मध्य में ही मृत्यु के तरफ अग्रसर होने के समय दोनों ऋषि तथा उनकी पत्नी द्वारा श्राप मिला कि जब वह अपनी पत्नी के साथ वैवाहिक सुख की कामना हेतु अग्रसर होगा तो उस समय उसकी म्रत्यु हो जायेगी !

पांडू की दो पत्नियाँ थी एक माद्री, मद्र राजा की पुत्री तथा दूसरी महाराज कुंती भोज की पुत्री कुंती ! इस प्रकार के श्राप से दुखी राजा पांडू अपने राज्य का कार्यभार अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र जो कि जन्म से अंधे थे उन्हें सौंप दिया!

कुंती जो की कुंती भोज की कन्या थी ! एक दिन दुर्वासा ऋषि के अपने पिता के महल में पधारने पर उनकी इतनी आतिथ्य सेवा की की दुर्वासा ऋषि कुंती के सेवा भाव से भाव विह्वल हो उठे !

परन्तु दुर्वासा ऋषि को कुंती के भविष्य की सारी कहानी पता चल चुकी थी ! इसलिए उन्होंने कुंती के सेवा भाव से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि वह जब चाहे उनके द्वारा प्रदत्त मंत्र से किसी भी देव का आहवाहन कर सकती हैं और उनसे वरदान के रूप में एक पुत्र प्राप्त कर सकती हैं !

किन्तु जिज्ञासा वश कुंती ने विवाह से पहले ही उस मंत्र की शक्ति को देखने हेतु सूर्य देव को अभिमंत्रित कर बुला लिया ! सूर्य देव की कृपा से अनब्याही कुंती को एक पुत्र प्राप्त हुआ ! लोक लाज के डर से कुंती ने उस पुत्र अपनी नौकरानी धत्री के मदद से एक डलिए में डालकर गंगा में बहा दिया !

 

सूर्य से प्रदत्त उस कुंती पुत्र का नाम कर्ण था जनम से ही कर्ण के शरीर में सूर्य कवच और कानो में कुंडल था ! सूर्य पुत्र होने के कारण कर्ण हर सुबह और शाम को अपने पिता सूर्य को जल चढाते थे !

कर्ण द्वारा सूर्य को सुबह और शाम को जल द्वारा अर्घ चढ़ाना और पूजन करना ही बाद में सूर्य षष्ठी और छठ पूजा के नाम से विख्यात हुआ !

 

 

 


 

 

 

to be continued,......

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