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Nanha pyara sa yah Bachapan,
Jeevan ka ek tukada bachpan,
Natkhat Nadani ka bachpan,
Vidya me jo duba tanmann,
Khelkood me gujra bachpan,
Yaad dilata hain pratikshan,
Rang Rangili duniya me,
Beeta he sunder sa bachpan!!

 

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Discussion started by sujata mishra , on 372 days ago
Replies
Gaurav
काश वो बचपन फिर आता,
मन उमंगो से भर जाता,
फिर स उड़ते हम सपनो के आसमा में
इच्छावों के पंख लगाये परियों के जहाँ में
काश वो सावन फिर आता
मन उमंगों से भर जाता
फिर से वो दिन लौट आते
जब कागज की कश्ती पानी में बहते
काश वो रातें फिर आती
मीठे मीठे सपने लाती
फिर से सुनती हमें दादी कहानी
दैत्यों के देश में परियो की रानी
काश मिलता वो पीपल का छांव
कच्ची पगडण्डी वो सपनो का गाँव
फिर से छिप जाता माँ के अंचल में
ममता की गोद नैनो के काजल में
काश मै फिर बच्चा बन जाता
यादों की गलियों में जाता
रहता मै हमेशा ख्वाबों में
लौट के फिर कभी न आता......
350 days ago
 
Gaurav
बाल दिवस है आने वाला,
खुशियों से मन बहलाने वाला,
दिल में नई उमंग जगाने वाला,
चाचा नेहरु की याद दिलाने वाला,
नेहरु जी को था बच्चों से प्यार, रखते थे
वो उनका ख्याल, बच्चे भी करते थे उनसे बड़ा प्यार,
चाचा -चाचा कहते, देते थे सत्कार.
आओ बच्चों आज हम यह प्रण करें,
बाल दिवस पर अच्छे बाल बनने के संकल्प करें.
फूलों की तरह महकें, खुशियों से बगिया हमारी सदा चहके,
बाल दिवस है आने वाला, चाचा नेहरु की याद दिलाने वाला
350 days ago
 
sujata mishra
Nanha pyara sa yah Bachapan,
Jeevan ka ek tukada bachpan,
Natkhat Nadani ka bachpan,
Vidya me jo duba tanmann,
Khelkood me gujra bachpan,
Yaad dilata hain pratikshan,
Rang Rangili duniya me,
Beeta he sunder sa bachpan!!
1081 days ago
 
sujata mishra
बाल दिवस

बाल दिवस हैं आने वाला,
चाचा नेहरू की याद दिलाने वाला....
चाचा नेहरू को बच्चे प्यार कराते हैं,
बाल दिवस तक याद रखते हैं....
चाचा नेहरू करते थे सबसे प्यार,
सब बच्चे करते थे उनसे अच्छा व्यहार....
बाल दिवस हैं आने वाला,
चाचा नेहरू की याद दिलाने वाला ....
लेख़क: चन्दन कुमार
कक्षा : ५
अपना घर , कानपुर
1081 days ago
 
sujata mishra
बाल दिवस / दिनेश कुमार शुक्ल :

चलती गाड़ी की खिड़की से
किसी अघाये यात्री ने
जैसे ही बाहर फेंकी जूठन
आधुनिकोत्तर भारत के
बच्चों की जैसे पूरी पीढ़ी
टूट पड़ी थी उस जूठन पर

लड़ती भिड़ती
गाली बकती
यह कितनी तेजाबी भाषा
जो मरोड़ती आँतों की
सुरंग से आती
और भीषण कुहराम मचाती -
बचपन के मुँह से
झरती वह
हिंसक उद्धत आहत भाषा,
वध्यस्थल से बचकर
जिन्दा रह पाने की
जीवट भाषा

वह भाषा भी किन्तु
हमारे बहरेपन की
चट्टानों से टकरा कर फिर
चाम चढ़ी पसली की
ढोलक में खो जाती

चीकट सना चीथड़ों लिपटा
निपट भयंकर
यह भी बचपन

प्राक्कथन यह
जीवन के दुःखान्त काव्य का
प्रथम पंक्ति ही जैसे
अपना अर्थ न पाकर
शब्दों का बेजान ढेर बन
रेत सरीखी बिखर गई हो।
बाल दिवस आता जाता है
यह किनका भारत महान
पीता पेप्सी पिज्जा खाता है ?
अजब खेल यह
शिशु आखेटक लकड़सुंघों का

शिशु आखेटक हाथों में
बचपन स्वदेश का
हमने तुमने सौंप दिया है,
भारी गफलत हुई
कि अब तो
लकड़सुंघो को पकड़ो भाई
लकड़सुंघों की करो धुनाई

बचपन चोरी करने वालो
बेच-बेच
अस्मिता देश की
तुमने जो कोठियाँ खड़ी कीं
उन्हीं कोठियों के बक्सों में
तुम्हें बन्द कर
जलसमाधि तुमको हम देंगे

भ्रूण हत्या के तुम अपराधी
तुमने सपनों को खा डाला
तुमने फूलों की क्यारी को
सत्ता के मद में अंधा बन

पूरी तरह कुचल ही डाला
तुम्हें किसी दुःस्वप्न की तरह
अपनी यादों से भी बाहर
करके ही
अब हम दम लेंगे।
1081 days ago
 
sujata mishra
पुरस्कृत कविता- बाल दिवस - किसके लिए

आया बाल दिवस
चर्चा हो गयी जरूरी।
बहस का मुद्दा क्या हो
बाल विकास या बाल मजदूरी॥

टी.वी. पे दिखे बच्चों के साथ पी.एम
अखबारों में आए सी.एम. के साथ बच्चे।
गरीब बच्चा साथ में नेताओं के संदेश
जगह-जगह टंग गए पोस्टर अच्छे-अच्छे॥

पर वो माँग रहा रेडलाइट पे सिक्का
जिसके लिए होगा लाखों का खर्चा।
जिसके खातिर भर दिये अखबारों के पन्ने
बाँट रहा वो बेख़बर चौराहों पे पर्चा॥

ये दिवस उसके लिए
जो बस-स्टॉप पर खड़ा है स्कूल जाने के लिए।
या फिर उसके लिए
जो है बस वहाँ बैग पहुँचाने के लिए॥

जो खरीद रहा है गुलाब
चाचा नेहरू का किरदार निभाने के लिए।
या जो बेच रहा गुलाब
बस अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए॥

जो बैठा है तोड़कर खिलौने को
छत पे उदास।
या जिसे खुद के टूटने का भी
ना हो आभास॥

जिसे सोने को अलग कमरा
और सुनाने को लोरी वाली रात।
या जिसे गाड़ियों की गूंज में
गोद में थपथपाता है फुटपाथ॥

वो जिसके लिए करता है कोई
मंदिर की सीढ़ियों पे पूजन।
या जिसे छोड़ गया कोई यहाँ
सीढ़ियों पर बिताने को बचपन॥

या फिर है बस एक दिवस
और दिवसों के जैसे।
जो आकर चला जाता और
रह जाते हालात वैसे के वैसे॥

ना कुछ बदलता है, ना कुछ सुधरता है
महलों में सींचता है, झुग्गियों में बिकता है।
तरस रहा गर बच्चा अपने बचपन के लिये
तो फिर यह बाल दिवस किसके लिये॥
1081 days ago
 
sujata mishra

चक दे बच्चे...
ये बचपन ऊटपटांगा...
न डालें फटे में टांगा...
चक दे बच्चे।
न भेदभाव, न झगड़ा...
न दुश्मन कोई तगड़ा...
चक दे बच्चे।
दिल में है उजियारा...
घर-संसार है सारा...
चक दे बच्चे।
न झूठ-कपट न पंगा...
न आपस में कोई दंगा...
चक दे बच्चे।
न सरहद का घेरा...
न गुटबाजी न डेरा...
चक दे बच्चे।
मन मैला न कुचैला...
न भरें लूट से थैला...
चक दे बच्चे।
बडे सभी हैं नंगे...
बस, मुन्ने सारे चंगे...
चक दे बच्चे।
ये भोले-भोले चेहरे...
न समझें कोई पहरे..
चक दे बच्चे।
न कोई इनकी जाति...
सब इनके संगी-साथी...
चक दे बच्चे।
न धरम-करम की बातें...
न डरी-डरी-सी रातें...
चक दे बच्चे।
कोई इनसे सीखे जीना...
सो, झुके कभी न सीना...
चक दे बच्चे।
चक दे..चक दे..चक दे..चक दे...चक दे बच्चे।

Source :अमिताभ फरोग
1081 days ago